इन नेताओं ने पुराणी सीटों को कहा अलविदा, नए सीट पर आज़मा रहे किस्मत


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जब दो संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों से लोकसभा चुनाव जीतने वाले कद्दावर नेता एक को चुनने के लिए आए, तो उन्होंने उस सीट को छोड़ दिया जहां उन्हें ज्यादा प्यार मिला। इस श्रेणी में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर व राजद प्रमुख लालू प्रसाद भी हैं, जो सारण प्रमंडल के छपरा व महाराजगंज संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ चुके हैं। और इसी श्रेणी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी और मुलायम सिंह जैसे विशेष नाम भी जुड़े हुए हैं। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने महराजगंज सीट को छोड़ा था तो राजद प्रमुख लालू यादव ने छपरा सीट को छोड़ दी थी। बड़ोदरा सीट पीएम मोदी ने, विदिशा सीट अटल बिहारी वाजपेयी ने और मुलायम ने अलग-अलग समय में कन्नौज और मैनपुरी सीट ज्यादा वोट मिलने के बावजूद छोड़ दिया था।

कई ऐसे उदहारण भी इसके विपरीत देखने को मिलते हैं। रायबरेली और आंध्र की मेडक से साल 1980 में जीती हुई इंदिरा गाँधी ने मेडक, दिल्ली और गांधीनगर से साल 1991 में जीते हुए आडवाणी ने गांधीनगर, अमेठी और कर्णाटक के वेल्लारी से साल 1999 में जीती हुई सोनिया ने अमेठी, और कन्नौज और फिरोजाबाद से साल 2009 में जीते हुए अखिलेश यादव ने कन्नौज की बेहद सीटें हासिल करके अपने पास रखकर मतदाताओं के सबसे अधिक प्यार का मान रखा।

छपरा और मधेपुरा से 2004 के चुनाव में खड़े हुए थे लालू

1989 में सारण प्रमंडल के महराजगंज सीट से जनता दाल के टिकट पर युवा तुर्क चंद्रशेखर चुनाव लाडे थे। यहां के 65.27 प्रतिशत मतदाताओं ने उनके सिर पर 3 लाख 82 हजार 488 मत देकर जीत का सेहरा बांध दिया था। दूसरी सीट यानि बलिया में 52.53 प्रतिशत मतदाताओं ने चंद्रशेखर को 2 लाख 51 हजार 997 मतों से जीता दिया था लेकिन उन्होंने महाराजगंज सीट को छोड़ दिया। अगर लालू प्रसाद की बात की जाए, तो उन्होंने छपरा और मधेपुरा दोनों ही सीटों से साल 2004 में ताल ठोंकी थे और दोनों जगहों से जीते थे। छपरा सीट से लालू को 2 लाख 28 हजार 862 वोट मिले थे जबकि 3 लाख 44 हजार 293 वोट पाकर उन्होंने मधेपुरा में शरद यादव को भारी मतों से हराया था, इसके बावजूद मधेपुरा वाली सीट लालू ने छोड़ दिया।

दो से अधिक सीटों पर 1996 तक ही लड़ सकते थे चुनाव

साल 1957 में अटल बिहारी वाजपेयी ने 3 सीटों से अपने भाग्य को आजमाया था, और वे बलरामपुर में चुनाव जीत गए थे। दूसरे स्थान पर लखनऊ में रहे जबकि उन्हें मथुरा में पराजित होना पड़ा था। “रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट 1951” में संशोधन के बाद 1996 तक ही 2 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की अनुमति थी पर बाद में रोक लगा दिया गया और सिर्फ 2 सीटों पर ही चुनाव लड़ने की अनुमति मिल सकी। 1 सीट पर ही चुनाव लड़ना अब भी बहस का मुद्दा बना हुआ है।


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