उधम सिंह..भारत का वो वीर बेटा जिसने अंग्रेजों से जलियांवाला बाग कांड का बदला लिया


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New Delhi : आज 13 अप्रैल है..वो दिन जब पंजाब के जलियांवाला बाग में नरसंहार हुआ। आज इस कांड की की 100वीं बरसी है। वह 13 अप्रैल, 1919 की मनहूस तारीख थी, जब पंजाब के जलियांवाला बाग में बैसाखी के अवसर पर तत्‍कालीन ब्रिट‍िश शासन के ब्रिगेडियर जनरल आर डायर ने अंधाधुंध गोलियां बरसाकर हजारों मासूम की जान ले ली।

वो बैसाखी का दिन था, बड़ी संख्‍या में लोग वहां जमा हुए थे। शाम करीब 5.30 बजे का वक्‍त रहा होगा, जब जनरल डायर अपनी सेना के साथ वहां पहुंचा। इसके बाद वहां एकमात्र निकास द्वार को बंद कर दिया और जनरल डायर ने अपने लोगों को फायरिंग का आदेश दिया। जनरल डायर के आदेश पर चली हुई गोलीबारी में हजारों लोगों ने अपनों को खोया, जो जिंदा रह गए, उनके दिलो-दिमाग पर इसका ऐसा गहरा घाव पड़ा कि वे इससे ताउम्र उबर नहीं पाए। इन्‍हीं में 20 वर्षीय युवा उधम सिंह भी थे। 5 साल की उम्र में अपना माता-पिता को खो चुके इस युवा के मन-मस्तिष्‍क पर इस घटना ने गहरे जख्‍म छोड़े और गहरे द्वंद्व-अंतर्द्वंद्व से गुजरते हुए उन्‍होंने अंतत: इसके लिए जिम्‍मेदार लोगों से बदला लेने की ठानी। 26 दिसंबर, 18199 को जन्‍मे उधम सिंह का लालन-पालन उनके माता-पिता के निधन के बाद अमृतसर के खालसा अनाथालय में हुआ था।

जिस दिन जलियांवाला बाग नरसंहार हुआ था, उधम वहां मौजूद लोगों को पानी पिला रहे थे। जनरल डायर के आदेश पर जब ताबड़तोड़ गोलियां चलीं तो उन्‍होंने एक-एक कर लाशों को गिरते देखा। इस घटना से बुरी तरह आहत उधम सिंह के भीतर अंतत: प्रतिशोध की आग सुलग चुकी थी। उन्‍होंने अपना जीवन देश को समर्पित कर देने का फैसला लिया और अमेरिका चले गए, जहां वह गदर पार्टी से जुड़े। वह ब्रिटिश शासन से मुकाबले के लिए विदेश में रह रहे भारतीयों को एकजुट कर रहे थे कि इसी बीच 1927 में भगत सिंह ने उन्‍हें भारत बुला लिया।

उधम सिंह अपने कुछ साथियों और हथियारों के साथ भारत लौटे। हालांकि उन्‍हें बिना लाइसेंस के हथियार रखने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया और पांच साल की कैद भी हुई। वह 1931 में रिहा हुए। इस बीच, जनरल डायर की भी मौत हो गई। जिस साल वह रिहा हुए, उसी साल भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को भी ब्रिटिश शासन ने फांसी दे दी थी। परिस्थितियां प्रतिकूल थीं, पर बदले की आग उनमें अब भी धधक रही थी। जनरल डायर ने 1919 में जब‍ इस नरसंहार का आदेश दिया था उस वक्‍त माइकल ओ’डायर पंजाब के गवर्नर थे। उधम सिंह पंजाब के गवर्नर को भी पूरे वाकये के लिए दोषी मानते थे।

वर्ष 1931 में जेल से रिहा होने के बाद उन पर कड़ी नजर रखी जा रही थी, लेकिन इसी बीच वह किसी तरह कश्‍मीर भागने में सफल रहे, जहां से वह पहले जर्मनी और फिर 1934 में लंदन पहुंचे। वह 13 मार्च, 1940 की तारीख थी, जब माइकल ओ’डायर लंदन के कैक्‍सटन हॉल में ईस्‍ट इंडिया एसोसिएशन और सेंट्रल एशियन सोसाइटी के एक कार्यक्रम में बोलने वाले थे। उधम सिंह वहां अपनी जैकेट की जेब में रिवॉल्‍वर लेकर पहुंचने में कामयाब रहे थे। उन्‍होंने तुरंत रिवॉल्‍वर निकाली और ओडायर पर तीन गोलियां दाग दीं। इसके बाद उधम सिंह वहां से भागे नहीं, बल्कि मुस्‍कराते हुए पुलिस के साथ चले गए। 31 जुलाई, 1940 को उन्‍हें लंदन की पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई और वहीं दफन कर दिया गया। बाद में 1947 में देश के आजाद होने के करीब ढाई दशक बाद 1974 में उनकी अस्थियां यहां लाई गईं, जिसका अंतिम संस्‍कार पंजाब के सुनाम में उनके जन्‍मस्‍थान पर किया गया।


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