कभी की खेत में मजदूरी तो कभी की चौकीदारी..एक पिता ने ऐसे बनाया अपने बेटे काे अफसर


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New Delhi : एक मां अपने बच्चे को नौ महीने पेट में रखती है लेकिन एक पिता उसे जिंदगी भर अपने दिमाग में रखता है। पिता अपनी खुशियां कुर्बान कर अपने बच्चों के सपने साकार करता है। ऐसे ही एक पिता हैं सूर्यकांत द्विवेदी। इन्होंने कभी चौकीदारी करके तो कभी खेत में मजदूरी कर अपने बेटे को अफसर बनाया है।

बछरावां निवासी सूर्यकांत (53) बताते हैं, मेरा परिवार थोड़ा बड़ा है। मैं तीन बेटों और एक बेटी का पिता हूं। शुरुआत में मेरी फैमिली ने काफी बुरे दिन देखे। 1991 में मैं लखनऊ यूनिवर्सिटी में चौकीदारी करता था। तब मेरी सैलरी 1100 रुपए थी। 6 लोगों का गुजारा इतने पैसों में होता था। बच्चे बड़े होने लगे तो उनकी पढ़ाई की चिंता मुझे सताने लगी। मैं सोचता था कि कहीं मेरे बच्चे भी मेरी तरह आर्थिक तौर पर कमजोर न रह जाएं। मैंने हार नहीं मानी। उनकी जरूरतें पूरी करने के लिए चौकीदारी से लेकर खेतों में मजदूर का काम तक किया। मेरे बेटे ने मेरी मेहनत को सफल बनाया है।

बेटे के बारे में सूर्यकांत बताते हैं, घर में पैसों की टेंशन हमेशा रहती थी। 1991 में तो हमारे घर में बिजली तक नहीं थी। मेरे बच्चों ने हाईस्कूल का एग्जाम लालटेन की रोशनी में पढ़ाई करते हुए दिया था। तंगी के बावजूद उनकी मेहनत में कमी नहीं थी और चारों डिस्टिंक्शन के साथ हाईस्कूल से पास हुए।


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