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जब JP ने दुनिया को कहा अलविदा तो रो पड़ा था पूरा देश, आज परिजनों को देखने भी नहीं जाता कोई – TCN
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जब JP ने दुनिया को कहा अलविदा तो रो पड़ा था पूरा देश, आज परिजनों को देखने भी नहीं जाता कोई

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PATNA… संपूर्ण क्रांति के प्रणेता लोकनायक जयप्रकाश नारायण की आज पुण्यतिथि है। इस दिन हम भी थे उनके ही गांव सिताबदियारा। सभी को याद है 08 अक्टू बर 1979 का वह दिन जब जेपी के नहीं रहने की सूचना उनके गांव पहुंची थी। तब यह सूचना पाकर सिताबदियारा का कोना-कोना खूब रोया था। इस दिन सिताबदियारा में बहुत ज्यादा चहल-पहल तो नहीं दिखी। हां जेपी की चर्चाएं कई जगहों पर होती दिखी। जेपी ट्रस्ट लाला टोला, जयप्रकाशनगर, आदि पर कुछ लोग उन्हें पुष्पांजलि देते भी दिखे। आज ही पता चला कि जेपी के गांव वाले अपने नेता को बाबा कहते हैं।

जयप्रकाश बाबू कोई नहीं कहता। जिससे पूछें वह यहीं कहता है आज ही के दिन बाबा का निधन हुआ था। लाइव बिहार को गांव के लोगों ने बताया कि यह वहीं दिन है, जिस दिन जेपी के गम में जयप्रकाशनगर में शाम का चूल्हा भी नहीं जला था। जेपी के गांव वालों के शब्दों में कहें तो आज की सरकारें या नेता जेपी को याद तो करते हैं किंतु दिल से नहीं करते। एक तरह से सभी ने मिलकर, जेपी के मूल्यों की ही तिलांजलि दे दी है। गांव के लोगों में दर्जनों लोग ऐसे भी मिले जिन्होंने बताया कि जेपी जन्म शताब्दीं वर्ष पर भी 2001 से 2003 तक देश भर में सिर्फ रस्म अदायगी ही तो हुई थी। जेपी के गांव में राजनीति का अपराधीकरण, उपाय आदि पर राष्ट्रीय विमर्श का आयोजन हुआ था। देश के कई कदावर लोगों ने उसमें भाग लिया था, किंतु निष्कर्ष क्या निकला ?

सारा जग जानता है। इस गांव के निवासी व जेपी आंदोलन के सहभागी अजब नारायण सिंह, श्रीराम यादव, आदि कहते हैं कि सारा देश इस बात से अवगत है कि कांग्रेसियों के लिए आजादी से पहले के जेपी और गैर कांग्रेसियों के लिए आजादी के बाद के जेपी महत्वपूर्ण रहे हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो आज की सरकारें या नेता न तो 1947 के पहले न उसके बाद के जेपी को दिल से याद करते हैं। जेपी के गांव में यूपी-बिहार को मिलाकर कुल तीन स्था नों पर जेपी ट्रस्टज गठित की गई है। इसमें यूपी सीमा का जेपी ट्रस्टस पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर द्धारा द्धारा स्था पित है। इस ट्रस्टर पर मौजूद यहां के व्यगवस्था पक अशोक कुमार सिंह से जेपी से लगाव के संबंध में पूछने पर उन्होंचने बताया कि आज के दिन देश के नेता जेपी को श्रद्धांजलि तो देते हैं, किंतु समझ में नहीं आता कि वह श्रद्धांजलि है या उनके विचारों की तिलांजलि।

बताया कि 1969 के बाद जब कांग्रेस में एकाधिकारवादी प्रवृति हावी हुई तो जेपी ने एक लेख लिख डाला। वह अपने भाषणों में भी उसका उल्ले ख करते थे। तब वह सक्रिय राजनीति में नहीं थे, पर इस बात को लेकर चिंतित थे कि जो नेता या दल अपने संगठन में लोकतंत्र नहीं चला सकता वह लोकतंत्र कैसे चलाएगा ? इंदिरा जी से मतभेद का कारण भी यही लेख बना।  सिताबदियारा के वकील शशिभूषण सिंह का कहना है कि जेपी आज होते तो देखते कि आज कितने दलों के संगठनों में तानाशही कायम हो चुकी है। वर्ष 1974-75 में जेपी आंदोलन के चार प्रमुख मुद्दे थे-महंगाई, बेरोजगारी, भष्टाचार और गलत शिक्षा नीति। आज कौन सी सरकार इन समस्याओं को सुलझाने के प्रति गंभीर है।

प्रभुनाथनगर के मुखिया प्रतिनिधि ने अजीत सिंह ने बताया कि आज राजनीति का मतलब ही बदल गया है। जेपी के मूल्यों को स्थापित करने की कोशिश कहीं नहीं है। आज चुनाव हो या अन्य उत्सव उसमें जेपी जरूर होते हैं किंतु उनके वह मुद्दे गायब होते हैं। आज के किसी भी चुनाव में जेपी के इन मुद्दों की चर्चा नहीं होती। अब तो धर्म, जाति, भ्रष्टाचार, परिवारवाद, वोट बैंक उठा-पटक को आधार बना राजनीति की जा रही है। सिताबदियारा के रहने वाले मनोज सिंह ने कहा कि आज के दिन एक बार फिर जेपी की पुण्यतिथि पर वही रस्म अदायगी की तैयारी है।

बिहार में तो जेपी सभी की जुबां पर ही रहते हैं। शायद ही कोई ऐसे नेता हो, जिनका संबोधन बिना जेपी का नाम लिए पूरा होता हो। जेपी को मानने वाले राजनीति से बाहर के लोग यह मानते हैं कि आज जेपी का नाम सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए ही लिया जा रहा है। उनकी सोंच से किसी को कोई सरोकार नहीं है। लाला टोला के संजीत यादव ने बताया कि आज 90% नेता जेपी की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि देकर उनके बताए रास्ते पर चलने का संकल्प लेते हैं, किंतु हाकीकत कुछ और ही नजर आती है। यह सब राजनीति चमकाने के लिए किया जाता है। वह लोकनायक को याद कर उनकी राहों पर चलते, तो आज तस्वीर भी कुछ और होती। मेरे शब्दों में अब देश में ऐसा कोई दल या नेता दिखाई नहीं देता, जो जेपी के बताए रास्ते पर चलता हो। यदि चलता तो आज भी साकार हो सकता है, जेपी का सपना।

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